एक महिला का अन्य महिलाओं और महरम पुरुषों के सामने पर्दा (सतर)

प्रश्न 82994

बहन और उसके भाई के बीच पर्दे (सतर) की सीमा क्या है? तथा बेटी का अपनी माँ या बहन के सामने कितना पर्दा है?

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

पहला : महिला का अपने महरम पुरुषों के सामने पर्दा

महिला का अपने महरम पुरुषों (जैसे पिता, भाई, भतीजा आदि) के सामने उसका पूरा शरीर सतर है, सिवाय उन अंगों के जो सामान्यतः खुले रहते हैं, जैसे चेहरा, बाल, गर्दन, दोनों भुजाएँ तथा दोनों पैर।

अल्लाह तआला ने फरमाया :

وَلا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلا لِبُعُولَتِهِنَّ أَوْ آبَائِهِنَّ أَوْ آبَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ أَبْنَائِهِنَّ أَوْ أَبْنَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي أَخَوَاتِهِنَّ أَوْ نِسَائِهِنَّ

النور/31

"और वे अपनी शोभा (ज़ीनत) प्रकट न करें, सिवाय अपने पतियों, या अपने पिता, या अपने पतियों के पिता, या अपने पुत्रों, या अपने पतियों के पुत्रों, या अपने भाइयों, या अपने भाइयों के पुत्रों, या अपनी बहनों के पुत्रों, या अपनी स्त्रियों के सामने।" (सूरत अन-नूर: 31)

अल्लाह ने महिला को अपने पति और महरमों के सामने अपनी ज़ीनत प्रकट करने की अनुमति दी है। यहाँ ज़ीनत से अभिप्राय स्वयं आभूषण नहीं, बल्कि उनके स्थान हैं। उदाहरण के लिए:

  • अंगूठी का स्थान — हाथ,
  • कंगन का स्थान — भुजा,
  • बाली का स्थान — कान,
  • हार का स्थान — गर्दन और सीना,
  • पायल का स्थान — पिंडली।

इमाम अबू बक्र अल-जस्सास रहिमहुल्लाह अपनी तफ़्सीर में कहते हैं :

"आयत का प्रत्यक्ष अर्थ यह है कि पति तथा उसके साथ जिन महरमों का उल्लेख किया गया है, उनके सामने ज़ीनत दिखाना जायज़ है। यह स्पष्ट है कि यहाँ ज़ीनत से अभिप्राय उसके स्थान हैं, जैसे चेहरा, हाथ और भुजा। इससे यह सिद्ध होता है कि आयत में उल्लिखित लोगों के लिए इन स्थानों को देखना जायज़ है। क्योंकि आयत के प्रारंभ में गैर-महरमों के लिए केवल बाहरी ज़ीनत की अनुमति दी गई है, जबकि पति और महरमों के लिए आंतरिक ज़ीनत के स्थानों को देखने की अनुमति दी गई है।

इब्न मसऊद और ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि उन्होंने ज़ीनत से अभिप्राय बाली, हार, कंगन और पायल लिया है।

आयत में पति और अन्य महरमों का एक साथ उल्लेख किया गया है, जिससे सामान्य रूप से यह सिद्ध होता है कि इन सभी के लिए ज़ीनत के स्थानों को देखना वैध है, जैसा कि पति के लिए है।"

इमाम अल-बग़वी रहिमहुल्लाह ने कहा:

"अल्लाह का कथन:  ولا يبدين زينتهن  'वे अपनी ज़ीनत प्रकट न करें' अर्थात गैर-महरम के सामने अपनी छिपी हुई ज़ीनत प्रकट न करें।

ज़ीनत दो प्रकार की होती है : प्रकट और छिपी हुई।

छिपी हुई ज़ीनत में पायल, पैरों की मेहंदी, कंगन, बालियाँ और हार आदि आते हैं। इन्हें प्रकट करना महिला के लिए जायज़ नहीं, और गैर-महरम के लिए इन्हें देखना भी जायज़ नहीं। यहाँ भी ज़ीनत से अभिप्राय उसके स्थान हैं।" उद्धरण समाप्त हुआ।

"कश्शाफ़ुल-क़िनाअ" (5/11) में है :

"पुरुष के लिए अपनी महरम स्त्रियों का चेहरा, गर्दन, हाथ, पैर, सिर और पिंडली देखना भी जायज़ है।

क़ाज़ी ने कहा : इस मत के अनुसार वह सब कुछ देखना जायज़ है जो सामान्यतः खुला रहता है, जैसे सिर और कोहनी तक दोनों हाथ।" उद्धरण समाप्त हुआ।

ध्यान रहे कि सभी महरम समान स्तर के नहीं होते। बल्कि निकटता और फ़ितने (आकर्षण) से सुरक्षा के अनुसार उनके बीच अंतर होता है। इसलिए महिला अपने पिता के सामने वह अंग प्रकट कर सकती है जो अपने पति के पुत्र (सौतेले बेटे) के सामने प्रकट नहीं करेगी।

इमाम अल-क़ुर्तुबी रहिमहुल्लाह ने कहा :

"जब अल्लाह तआला ने पतियों का उल्लेख किया और उनसे शुरुआत की, तो उनके बाद महरमों का उल्लेख किया और ज़ीनत प्रकट करने के मामले में सबको एक साथ रखा। लेकिन, लोगों के दिलों में जो है, उसके हिसाब से उनके स्तर अलग-अलग होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि महिला का अपने पिता और भाई के सामने खुलना, अपने पति के पुत्र (सौतेले बेटे) के सामने खुलने की अपेक्षा अधिक सुरक्षित है। इसलिए जो उनके सामने प्रकट किया जा सकता है उसकी सीमा भी अलग-अलग होती है।

इसलिए जो कुछ पिता के सामने प्रकट किया जा सकता है, वह पति के पुत्र के सामने नहीं प्रकट किया जा सकता।"

दूसरा : महिला का दूसरी महिलाओं के सामने पर्दा

फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) के अनुसार, महिला का दूसरी महिला के सामने सतर नाभि से लेकर घुटनों तक है, चाहे वह दूसरी महिला उसकी माँ हो, या बहन हो या कोई अन्य महिला।

अतः किसी महिला के लिए दूसरी महिला के नाभि और घुटनों के बीच के भाग को देखना जायज़ नहीं, सिवाय ज़रूरत (अत्यावश्यक स्थिति) के समय, या चिकित्सा आदि की आवश्यकता के।

लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि महिला दूसरी महिलाओं के बीच केवल नाभि और घुटनों के बीच का भाग ढककर बैठ सकती है।

ऐसा व्यवहार केवल निर्लज्ज, शीलहीन या चरित्रहीन स्त्रियाँ ही करती हैं।

इसलिए फ़ुक़हा के इस कथन — "महिला का सतर नाभि और घुटनों के बीच है" — का गलत अर्थ नहीं लेना चाहिए। उनका अभिप्राय यह नहीं कि यही महिला का सामान्य पहनावा हो, जिसमें वह अपनी बहनों और सहेलियों के बीच रहे। ऐसी बात न तो बुद्धि स्वीकार करती है और न ही स्वाभाविक लज्जा (फ़ितरत)।

बल्कि दूसरी महिलाओं तथा अपनी बहनों के सामने भी महिला का वस्त्र ढकने वाला, पूर्ण और शालीन व मर्यादित होना चाहिए, जो उसकी हया (लज्जा) और गरिमा को प्रकट करे।

उसके शरीर से केवल वही अंग दिखाई दें जो सामान्य कामकाज या सेवा करते समय प्रायः खुल जाते हैं, जैसे सिर, गर्दन, भुजाएँ, तथा दोनों पैर, जैसा कि महरमों के संबंध में पहले उल्लेख किया गया।

स्थायी फ़तवा समिति (अल-लजनह अद-दाइमह) का भी इस विषय में एक फ़तवा है कि महिला अपने महरमों और दूसरी महिलाओं के सामने कितना भाग प्रकट कर सकती है। जिसका उल्लेख प्रश्न संख्या (34745) के उत्तर में किया जा चुका है।

अल्लाह से दुआ है कि वह हमें और आपको सही मार्गदर्शन और सफलता प्रदान करे।

और अल्लाह ही सबसे अधिक जानने वाला है।

संदर्भ

महिलाओं के कपड़े

स्रोत

साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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